दिल्ली के चुनाव

भाजपा के दिल्ली में सरकार न बनाने के दावे के बाद दिल्ली में चुनावो का माहौल गरमा रहा है। चुनाव की तारीख तो अभी नहीं आई परंतु आम आदमी पार्टी पूरी ताकत के साथ फिर सक्रिय हो गयी है। नजीब जंग ने जैसे ही राष्ट्रपति को विधानसभा भंग करने को कहा उसके कुछ ही समय के बाद अरविन्द केजरीवाल हर एक चैनल पर अपने साक्षत्कार देते हुए घूम रहे है। रविश कुमार वाले शो में तो यहाँ तक खुलासा हो गया की अरविन्द केजरीवाल का चश्मा थोड़ा टूट गया है और दिल्ली चुनाव लड़ने के लिए उन्हें चंदे की सख्त आवश्यकता है।

मीडिया फिर से लाइट कैमरा एक्शन के जुगाड़ में लगा गया है लेकिन जनता इस बार सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टचार के मुद्दे पर वोट नहीं देने वाली। चाय का जला छाछ भी फूँक फूँक कर पीता है दिल्ली के पिछले चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से ४९ दिन में प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल होने के लिए विधानसभा से त्यागपत्र दिया उससे अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी पे बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया की उनमे और दूसरी राजनैतिक दलों में क्या अंतर है, अरविन्द जो भी कहे लेकिन ४९ दिन में सरकार छोड़ने का कारण सभी को पता है।

भाजपा ने दिल्ली के लोगो की मानसिक अवस्था को भलीभांति भांप लिया है और समझ गए है की पिछले विधानसभा चुनावो में जिस तरह से लोगो ने आम आदमी पार्टी को प्रतिसाद दिया वो इस बार नहीं होने वाला। भाजपा ए भी जानती है की मोदी के नाम पर वोट लेना बहुत कठिन काम नहीं होगा इसलिए उन्होंने आने वाले चुनावो में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है और चुनवा के पहले करेंगे भी नहीं। आम आदमी पार्टी या फिर अरविन्द केजरीवाल को मोदी से जीतने में दांतो तले ऊँगली चबानी पड़ेगी और वो इस बार पिछली बार से काम सीट पाएंगे इसमे कोई दो राय नहीं है।

दिल्ली पर लगातार १५ साल शासन करनेवाली कांग्रेस कोशिश तो कर रही है? लेकिन मीडिया और जनता दोनों ने उन्हें सिरे से नकार दिया है। कांग्रेस के पास कोई भी सफल नेतृत्व नहीं है जो उन्हें सफलता दिला सके। कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओ ने भी हार मानकर बैठने में अपनी समझदारी मान ली है और चुनाव के बाद फिर उनका कोई बड़ा नेता हार की सामूहिक जिम्मेदारी लेकर ये कह देगा की हम आत्ममंथन करेंगे और उसके बाद संघटन में बदलाव होंगे। और फिर कह देंगे की हम पहले भी चुनाव हारे है और फिर जीतकर वापसी की है।

दिल्ली में आने वाले दिनों में बहुत कुछ नया और पुराना सामने आएगा। चैनल वाले फिर से आपको संभवनाओ के हिसाब से विश्लेषण बताते रहेंगे । आप भी आते रहना हमारे ब्लॉग पर। हम आपको अफवाहों में से राजनीति तलाशकर कुछ रोचक तथ्य समझाएंगे।

विकास या मूर्ति​या

भारत के राजनेता असली मुद्दों और समस्याओं को समझने में विफल क्यों है ? मैंने कुछ महीने पहले अपने एक लेख में इस बात का ज़िक्र किया था. मैं ​ने उस लेख में उन स्मारकों और स्मारक के विकास में ​नेताओ द्वारा ​अपना समय और ​जनता का ​पैसा खर्च करने का कारण ​भी ​लिखा है​. स्मारको और मूर्तियो का निर्माण मतदाताओ को भावनात्मक रूप से जोड़कर राजनीति​ में अपने वोट बैंक की रक्षा ​करना ​है​. बहन मायावती ने मूर्तियो के निर्माण तो एक कीर्तिमान ही बना डाला उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ साथ खुद की प्रतिमा ​भी बनवा दी। ​

​अरब सागर में शिवाजी का एक स्मारक बनाने की भी बात चल रही थी​. ​मैंने सरकार के शिवाजी के स्मारक के नाम पर होने वाली राजनिति का पुरजोर विरोध किया। स्मारक में होने वालो पैसे का इस्तमाल हम ​अन्य सामाजिक विकास के मुद्दों के लिए कर सकते है। सरकार ​का ए मानना है कि ​इस स्मारक से पर्यटन ​बढ़ेगा और सरकारी ​राजस्व में वृद्धि होगी​, परन्तु सरकार ए भूल गयी कि स्मारक पर खर्च हुए पैसे को कमाने में कई वर्ष लग जाएंगे।

​​हम सभी जनाते है कि ​भारत ​का नाम उन देशो में शामिल है जहा आज भी ​कुपोषण ​है। भारत ​का स्वास्थ्य के क्षेत्र में ​विकास ​अभी तक उम्मीद से कम है और हम स्मारकों के विकास पर पैसा खर्च कर रहे हैं​. कई लोगो ​ने ​शिवाजी प्रतिमा के निर्माण के लिए महाराष्ट्र सरकार के फैसले की आलोचना की है, लेकिन अब ​उनमे से ही कई लोग सरदार पटेल की प्रतिमा के निर्माण के लिए मोदी के फैसले का समर्थन कर ​रहे हैं​. ​

मुझे ​लगा था ​नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति मूर्ति ​से ​परे ​सोचेंगे, परन्तु नरेंद्र मोदी ने मुझे गलत साबित कर दिया।​नरेंद्र मोदी सरदार पटेल कि मूर्ति ​पर खर्च होनेवाले ​पैसे ​से एक अंतरराष्ट्रीय अस्पताल ​या एक अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ​बनाने का फैसला ​करते तो शायद देश के लिए अच्छा होता। 

सरदार की प्रतिमा पर आपकी क्या राय है ?​​